अनुकूलता गणना (कूट मिलान) कैसे काम करती है
वैदिक अनुकूलता मिलान को 'अष्टकूट' कहते हैं: आठ कसौटियाँ, कुल छत्तीस अंक। उत्तर भारत में विवाह के निर्णय में यह लंबे समय से एक आधार रहा है।
आठ कूट, बढ़ते भार के क्रम में: वर्ण (1), वश्य (2), तारा (3), योनि (4), ग्रह मैत्री (5), गण (6), भकूट (7) और नाड़ी (8)।
महत्वपूर्ण बात: ये आठों केवल चंद्रमा की स्थिति से निकलते हैं। दोनों की चंद्र राशि और नक्षत्र ज्ञात होने पर शेष शास्त्रीय तालिकाओं से यांत्रिक रूप से तय होता है।
प्रत्येक कूट क्या देखता है
वर्ण स्वभाव की श्रेणी देखता है, वश्य पहल का संतुलन, तारा दोनों नक्षत्रों की दूरी से शुभाशुभ, योनि शारीरिक-सहज अनुकूलता। ग्रह मैत्री दोनों चंद्र राशियों के स्वामियों की मित्रता देखती है।
भकूट और नाड़ी शास्त्रीय रूप से सबसे भारी हैं। भकूट 6-8, 5-9 या 2-12 संबंध में शून्य होता है; नाड़ी दोनों की समान होने पर शून्य होती है।
यह पृष्ठ केवल कुल नहीं, आठों का विभाजन दिखाता है। 24 अंक योनि में खोए हों या नाड़ी में — अर्थ पूरी तरह भिन्न है।
अंक को कैसे समझें
अठारह अंक को प्रायः मेल की सीमा कहा जाता है, पर इसे अक्षरशः नहीं लेना चाहिए। अष्टकूट केवल दो चंद्र स्थितियाँ देखता है।
व्यवहार में कम अंक वाले संबंध भी भली-भाँति चलते हैं और अधिक अंक वाले भी कठिन दौर देखते हैं। शास्त्रों में भकूट दोष के निरस्त होने के कई नियम हैं।
हम इस अंक को अकेले संबंध जारी रखने के निर्णय का आधार बनाने की सलाह नहीं देते। इसका उचित उपयोग यह समझने की शुरुआत के रूप में है कि दो लोगों के बीच क्या घटित होता है।
- अंक केवल दो चंद्र स्थितियों से निकलता है
- भकूट या नाड़ी में शून्य कुल अंक से भारी माना जाता रहा है
- शास्त्रों में दोष-निरसन के नियम हैं, जिन्हें यांत्रिक गणना नहीं पकड़ती