मंगल दोष (कुज दोष) क्या है
मंगल दोष उस स्थिति को कहते हैं जब मंगल लग्न से पहले, दूसरे, चौथे, सातवें, आठवें या बारहवें भाव में हो। इसे 'कुज दोष' भी कहा जाता है, कुज मंगल का ही एक नाम है। परंपरागत रूप से इस स्थिति को विवाहित जीवन में घर्षण या संघर्ष की संभावना का संकेतक माना जाता है।
सभी छह भाव समान भार के नहीं होते। सातवें भाव (जीवनसाथी का भाव) या आठवें भाव (जीवनसाथी की आयु और साझा संसाधन) में मंगल को अधिक भारी माना जाता है, क्योंकि ये भाव सीधे विवाह से जुड़े होते हैं।
'निरसन' की बात को क्यों नहीं टाला जा सकता
शास्त्रीय ग्रंथ मंगल दोष को यांत्रिक उपस्थिति-अनुपस्थिति के रूप में नहीं देखते। निरसन (दोष भंग) की कई शर्तें दर्ज हैं — मंगल का स्वराशि (मेष या वृश्चिक) या उच्च राशि (मकर) में होना, शुभ ग्रहों की पर्याप्त दृष्टि, या दोनों कुंडलियों में समान स्थिति का होना।
इस पृष्ठ की जाँच इस बिंदु पर जान-बूझकर सीमित है। यह केवल यांत्रिक रूप से जाँचता है कि मंगल छह भावों में से किसी एक में है या नहीं — ऊपर बताई गई किसी भी निरसन शर्त का मूल्यांकन नहीं करता। यह लापरवाही नहीं, एक ईमानदार सीमा-रेखा है।
परंपरा के अनुसार भार भिन्न होता है
मंगल दोष को कितनी सख्ती से देखा जाए, यह क्षेत्र, परिवार और ज्योतिषी के अनुसार भिन्न होता है। उत्तर भारत की कुछ परंपराओं में इसे विवाह मिलान के सबसे महत्वपूर्ण बिंदुओं में गिना जाता है, जबकि अन्य क्षेत्रों में इसे अष्टकूट जितना भार नहीं दिया जाता।
यह पृष्ठ साथ ही अन्य कौन-से योग दिखाता है
मंगल दोष इस साइट द्वारा पहचाने जाने वाले संयोगों में से एक मात्र है। उसी कुंडली में कालसर्प दोष, गजकेसरी योग, बुधादित्य योग, और पाँच पंचमहापुरुष योग भी साथ ही जाँचे जाते हैं।
- यह जाँच केवल यह यांत्रिक रूप से पुष्टि करती है कि मंगल लग्न से छह भावों में से किसी एक में है
- शास्त्रीय निरसन शर्तें कई हैं और उनके आकलन के लिए विशेषज्ञ निर्णय आवश्यक है
- इसे कितना महत्व दिया जाए यह क्षेत्र और परंपरा के अनुसार बहुत भिन्न होता है